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लोकपाल से ज्यादा जरूरी लोक में भरोसा

Posted On: 29 Jun, 2011 में

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लोकतंत्र में सबसे अहम है लोक यानी जन यानी जनता। वही जिसे राजनैतिक दल मतदाता कहते हैं। यह जनता मतदाता है इसमें कोई शक नहीं, लेकिन कतिपय मूढ़ राजनैतिज्ञों ने इसे केवल मतदाता मान लिया है। यह मान कर वे चलते हैं कि जनता की जिम्मेदारी पांच साल में एक बार आती है, तब तो हम कोई न कोई करिश्मा कर उसे बेवकूफ बना लेगें। जनता को बेवकूफ मानने वालों की बुद्धि को क्या कहा जाये। यह वही जनता है, जिसने जब तक दाल में नमक खाया गया बर्दाश्त किया, जब नमक में दाल खाई जाने लगी तो वह बिफर पड़ी, यह बाद दीगर है कि इस जनाक्रोश को जो दिशा दी जानी चाहिए, उसे ये दिशाहीन दल नहीं दे पा रहे हैं, वजह है उनका जन सरोकार से नाता कट जाना है। लोकपाल-लोकपाल का हल्ला मचाने से कहीं ज्यादा जरूरी यह है कि उस जनता को जागरूक किया जाना चाहिए, जो हर पांच साल, कभी कभी मौका लगा तो पांच साल में दो-बार तीन बार अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है। उसके पास जो सीमित विकल्प हैं, उसमें से उसे जो ठीक लगता है, उसे वह चुन लेती है। जनता बुद्धिमान है, इस पर शक नहीं किया जाना चाहिए, अन्यथा असम में तरुण गोगई,  बिहार में नितीश कुमार, गुजरात में नरेंद्र मोदी, उड़ीसा में नवीम पटनायक, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह को बार-बार नहीं चुनती। करुणानिधि,  बुद्धदेव भट्टाचार्य,  इसके पहले मुलायम सिंह, वसुंधरा राजे जैसे कद्दावर नेताओं को बाहर का रास्ता न दिखाती।

लोकतंत्र की पहरेदारी करने वाली इस देश की तकरीबन एक अरब से अधिक जनता पर हमें भरपूर विश्वास करना चाहिए। जनता ने जब बदलाव किया  तो इंदिरा गांधी जैसी नेता के पैरों तले जमीन खिसक गई, मिस्टर क्लीन जो क्लीन स्वीप करके आये थे, उनकी अकल भी ठिकाने जनता ने ही लगाई. इसी राजनैतिक तंत्र ने, इसी लोकतांत्रिक प्रणाली ने बोफोर्स और यूनियन कार्बाइड दोनों का फैसला अपने वोट से कर दिया। अब अदालतें अपनी कार्यवाही करें या फिर जांच एजेंसियां।  इसी लोकतंत्र ने राजा नहीं फकीर है, भारत की तकदीर है जैसे नारों पर सवार होकर सत्ता में पहुंचे वीपी सिंह को उनके गलत फैसलों पर जनता ने गेट आउट कर दिया था। भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की आत्ममुग्धता उसे रास नहीं आयी, तो मनरेगा की लहर पर सवारी कर रही जनता महंगाई की मार को एक बार भूली तो उसे कांग्रेस का कहर झेलना ही पड़ रहा है, वह भी उसी महंगाई का, जिसने पहले ही कमर तोड़ रखी थी, ऐन चुनाव पर कुछ राहत देकर उसने मैदान मार लिया। कांग्रेस के भ्रष्टाचार उजागर हो रहे हैं। उन पर कार्रवाई हो रही है, और कार्यवाही भी। 

ऐसे में लोकपाल, सशक्त लोकपाल, लोकपालों की ज्यूरी जैसे जुमले को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनाना चाहिए। अन्ना और रामदेव का आंदोलन उस समय कहा गया था, जब यूनियन कार्बाइड मामले में राजीव गांधी का नाम आया और संदिग्ध भूमिका वाले अर्जुन सिंह ने पहले लीपापोती शुरू की, बाद में स्वयं रह ही नहीं गये दुनिया में। लोकपाल से कहीं ज्यादा जरूरी है देश के कालेधन की वसूली। मजे की बात यह है कि मुझे कई जगह यह उपदेश पढ़ने को मिला है कि कालेधन का स्रोत टैक्स चोरी बताने की कोशिश की है, और कुछ ऐसे ही कुछ बातें प्रचारित की जा रही हैं। कालेधन पर रोक लगाने के ऐसे अनर्गल तरीके बताये जा रहे हैं, और सरकार के टैक्सेशन सिस्टम से परेशान व्यापारियों व उद्यमियों को निशाने पर लेने की कोशिश की जा रही है, जो वास्तव में कालेधन के संवाहक हैं ही नहीं। जो उनका कालाधन बताया जा रहा है,  वे इस रास्ते से वे न बचायें तो उनके कपड़े उतर जायेंगे, लेकिन सरकार का टैक्स अदा नहीं हो पायेगा। दरअसल नेताओं और अफसरों द्वारा रिश्वत से जो धन जमा किया जा रहा है, वह काला धन है। इस कालेधन की वापसी में ही भ्रष्टाचार की मां छुपी हुई है। एक बार कालेधन की वापसी शुरू हो जाये, तो यह अपने आप रुक जायेगा। हमारा कालाधन वापस आ जाये तो व्यापारी और उद्यमी उस टैक्सेशन से भी बच जायेंगे, जो अभी तक इस देश की अर्थ व्यवस्था को सुधारने के लिए अनाप-शनाप लगाया जा रहा है। व्यापारी व उद्यमी तो टैक्सों की सूची बनाते-बनाते उसका हिसाब लगाते-लगाते परेशान हो चुका है।

हां बात लोकपाल की हो रही थी। इस देश का लोकपाल लोक है, यह लोकतांत्रिक प्रणाली में निहित है। इसमें किसी फालतू के लोकपाल की जरूरत नहीं है। अब तत्काल की कार्रवाई को जरूरी बताते हुए कुछ लोग लोकपाल की वकालत करेंगे, लेकिन सशक्त लोकपाल के जो खतरें हैं, उनसे यह देर भली है। देश अधिनायकत्व की तरफ तो नहीं जायेगा।

अब देखने की जरूरत है कि इस व्यवस्था में भ्रष्टाचार की जड़ है कहां। दरअसल भौतिकवादी व्यवस्था ही इसकी जड़ है जिसने हमारी जरूरतों मे अनावश्यक जरूरतों को शामिल कर दिया है।  रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य और शिक्षा के साथ ही मोबाइल और टेलीविजन हमारी जरूरत की वस्तु में शामिल हो गई हैं। इस व्यवस्था की ही देन है कि  शिक्षा व स्वास्थ्य दोनों सेवाएं खासी महंगी हो चली हैं। फीस इतनी ज्यादा है कि एक गरीब आदमी अपने बच्चे को अब डाक्टर व इंजीनियर बनाने के बारे में सोच ही नहीं सकता। उसकी प्रतिभा धरी की धरी रह जाती है, क्योंकि उसके पिता के पास पैसा नहीं होता है। इसी तरह से व्यक्ति की ईमानदारी उस समय उसे भार लगने लगती है, जिस समय अपने बच्चे या पत्नी या स्वयं के इलाज का भारी-भरकम बिल उसे चुकाना पड़ता है। निचले स्तर पर जो भ्रष्टाचार है, वह उसी आर्थिक सुरक्षा का अभाव है,  जनता को यही चाहिए। जो इन जरूरतों को पूरा नहीं करेगा, वह सत्ता में नहीं रहेगा। 

लोक पाल से ज्यादा जरूरी है, इस जनता को सजग करना, ताकि जनता की सही नुमाइंदगी करने वाले विधायक व सांसद बनें। गगनबिहारियों का खात्मा हो। क्या अन्ना क्या बाबा, सबका ध्यान इधर ही होना चाहिए, ताकि चोर की मां को सजा दिलाई जा सके, आप सभी जानते हैं कि वह कौन है।

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

J L SINGH के द्वारा
July 1, 2011

त्रिपाठी साहब, आपके विचार महत्वपूर्ण हैं. आइये हम सभी कसम खाएं, मतदान करने अवश्य जाएँ और सही व्यक्ति को मत दें.

shaktisingh के द्वारा
June 29, 2011

भारत में ऐसे बहुत अनगिनत लोग है जिसे यह भी नहीं पता कि लोकपाल होता क्या है?,  यहां तो प्रत्येक राजनीति पार्टी और कुछ अन्य संस्था अपने तौर तरिके से जनता का भरोसा जितना चाहती है, लेकिन जनता को यह समझ में नहीं आता कि किस राजनीति पार्टी पर अपना भरोसा जाहिर करें.


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